- नेताजी सुभाष चंद्र बोस को कई बार अपनी पहचान बदलनी पड़ी थी; यह उस समय की कहानी है जब वह मौलवी ज़ियाउद्दीन बन गए थे।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस को कई बार अपनी पहचान बदलनी पड़ी थी; यह उस समय की कहानी है जब वह मौलवी ज़ियाउद्दीन बन गए थे।

सुभाष चंद्र बोस को इसी नाम से जाना जाता है। लेकिन कई मौकों पर उन्हें अपनी पहचान बदलनी पड़ी। आज हम आपको नेताजी की वह कहानी बता रहे हैं जब उन्होंने मौलवी जियाउद्दीन की पहचान अपनाई थी।

आज भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बहादुर नेता नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम हर भारतीय के दिल में जोश और उत्साह भर देता है। आज नेताजी की 129वीं जयंती है। माना जाता है कि नेताजी की मौत ताइपे में एक विमान दुर्घटना में हुई थी। उनकी देशभक्ति की कई साहसी कहानियाँ हैं। आज हम आपको नेताजी की वह कहानी बता रहे हैं जब उन्हें अपनी पहचान बदलनी पड़ी थी।


जब बने ऑलेन्डो मेजेरेटा और कमांडर मक्सूदा को नियुक्त किया गया

वैसा ही तो सही सलामत चंद्र बोस को उनके इसी नाम से जानते हैं। लेकिन कई अपने ऐसे उपकरण पर परिस्थिति के अनुसार वह नाम बदल लेते थे। 1941 में जब उन्हें कोलकाता में घर में नजरबंद किया गया था, तब वे बैठे नहीं रहे, बल्कि अंग्रेजी साम्राज्य की नजरों में धूल झोंक कर रात के अंधेरे में डूबे हुए छात्र-छात्राओं के पहरे से उसी तरह निकल गए, जिस तरह से छत्रपति शिवाजी महाराज औरंगजेब के पहरे से निकले थे। उस समय उन्होंने अपना नाम मौलवी जियाउद्दीन रख लिया। तब उन्होंने मौलवी जियाउद्दीन का रूप धारण कर लिया।

लेकिन नाम परिवर्तन का उनका यही एक किस्सा नहीं है। जब वे जर्मनी क्षेत्र में आये तो उन्होंने अपना नाम ऑलेन्डो मेजेरेटा रखा। जब वह सबमरीन में जापान गया तो काल्पनिक करि- युद्ध के दिनों में सबमरीन पानी की नाव में था, पल-पल का खतरा था, लेकिन सबमरीन को सुरक्षित जाना था। पनडुब्बी में रखा गया और वहां अपना नाम कमांडर मक्सूदा रखा गया।

मौलवी जिया शेख़ शेखर कोलकाता से पेशावर तक की यात्रा
असलहा, नीबुद्दीन जियाउद्दीन को कालका मेल से दिल्ली इंट्रेस्ट ट्रेन बदलानी थी। वहां से फ्रंटियर मेल जो उन्हें पेशवर ले जाते हैं। जब तक वे दिल्ली स्टेशन पर फ्रंटियर मेल में सवार नहीं हो जाते, तब तक उन्हें दिल्ली स्टेशन पर अतिरिक्त सावधानी बरतनी थी। द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था। दिल्ली राजधानी होने का कारण खुफिया जासूसों से भरा हुआ था। ज़ियाउद्दीन साहब को सम्मानित सभी साथियों से खुद को बचाते हुए दिल्ली से पेशावर की यात्रा करनी थी। दिल्ली में उन्होंने ट्रेन को अन्यत्र और सुरक्षित रूप से पेशवर के लिए निकाल दिया।

19 जनवरी, 1941 की देर शाम दिल्ली से आने वाली फ्रंटियर मेल पेशावर जंक्शन स्टेशन पर। एक धर्मपरायण मुस्लिम और पतीनी पोशाक में मोहम्मद ज़ियाउद्दीन स्टेशन पर प्रवेश। पेशावर बॉटम रेलवे स्टेशन पर सुभाष चंद्र बोस के राजनीतिक दल 'फोरवर्ड ब्लॉक के फ्रंटियर' के नेता अकबर शाह उनकी पहुंच का इंतजार कर रहे थे। प्लैन्टी पोशाक में मुस्लिम सज्जनों को स्टेशन से बाहर देखने पर अकबर शाह को समझ आया कि यह सबसुबाबुब बाबू ही हैं, क्योंकि अकबर शाह ने नेम के लिए जो प्लैथी सलवार सोसाइटी से खरीदा था, उसे धारण करने के लिए अकबर शाह ने कहा था।

इसके बाद अकबर शाह, ज़ियाउद्दीन के पास आये और दोनों ने एक दूसरे को डेट किया। फिर अकबर शाह,सुभाष के हाथ से उनके अनाड़ी लेकर के पास ही एक तांगे की ओर इशारा किया जो अकबर ने सबसे पहले ही स्टेशन पर खड़ा करवा लिया था। इसके बाद एसोसिएट्स को स्टोक्स होटल में छिपाया गया, जहां उन्होंने एक रात ठहरने के लिए स्थानीय इलाके में जाकर पूछताछ की। यूनिवर्सिटी को आबाद खान के घर ले जाया गया। यहां उन्हें स्थानीय रीति-रिवाज, पश्तो भाषा और कबीली जीवन शैली से परिचित कराया गया, ताकि कोई शक न कर सके। उनका रूप गूँज-बाहरा पठार बनाया गया और उनका नाम एक ही संविधान बनाया गया।

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