सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट के एक फ़ैसले का *स्वतः संज्ञान* (suo motu cognizance) लिया है, जिसमें कहा गया था कि किसी महिला की सलवार उतारने की कोशिश करना रेप की कोशिश नहीं माना जा सकता। बेंच ने पाया कि फ़ैसले में आपत्तिजनक टिप्पणियाँ थीं और इसे रद्द किया जा सकता है।
बुधवार को, सुप्रीम कोर्ट ने रेप केस में पटना हाई कोर्ट के विवादित फ़ैसले का *स्वतः संज्ञान* लिया और कहा कि फ़ैसले में आपत्तिजनक टिप्पणियाँ शामिल थीं। 9 जुलाई को रेप के आरोपी एक व्यक्ति को बरी करते हुए, पटना हाई कोर्ट ने कहा था कि महिला की सलवार उतारने की कोशिश करना और उसकी छाती दबाना रेप करने की कोशिश को "साफ़ तौर पर साबित" नहीं करता है।
चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने फ़ैसले में आपत्तिजनक टिप्पणियों को देखते हुए *स्वतः संज्ञान* लिया।
पटना हाई कोर्ट ने क्या कहा?
एक फ़ोटोग्राफ़ी स्टूडियो के अंदर एक कस्टमर के साथ यौन उत्पीड़न की कोशिश के आरोपी व्यक्ति की सज़ा को रद्द करते हुए, पटना हाई कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में नाकाम रहा। कोर्ट ने माना कि महिला की सलवार उतारने की कोशिश और उसकी छाती दबाने की हरकत को रेप की कोशिश के तौर पर वर्गीकृत नहीं किया जा सकता—खासकर तब जब यौन संबंध या रेप की मंशा दिखाने वाली किसी हरकत का कोई सबूत न हो। कोर्ट ने पाया कि हालाँकि महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाने का अपराध तो बनता है, लेकिन रेप की कोशिश का आरोप साबित नहीं हुआ।
कोर्ट ने कहा कि अगर अभियोजन पक्ष के मामले को "पूरी तरह" मान भी लिया जाए, तो भी जो अपराध साबित होगा, वह "ज़्यादा से ज़्यादा" भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354 के तहत आएगा—यानी महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाने की मंशा से हमला करना या आपराधिक बल का इस्तेमाल करना।
यह मामला क्या है?
इस फ़ैसले के बाद आरोपी को बरी कर दिया गया। रेप की कोशिश के कथित मामले को 2008 में बिहार के बांका में दर्ज किया गया था। 20 जनवरी 2008 को, बिहार के बांका में एक स्टूडियो मालिक के ख़िलाफ़ रेप की कोशिश के लिए FIR दर्ज की गई थी। युवती ने आरोप लगाया कि वह अपने पिता के साथ फोटो खिंचवाने के लिए स्टूडियो गई थी, तभी मालिक ने दरवाज़ा बंद कर दिया, उसकी सलवार उतारने की कोशिश की और रेप करने की नीयत से उसकी छाती दबाई।
**मामला 13 साल तक चला**
2013 में, बांका कोर्ट ने स्टूडियो मालिक को रेप की कोशिश का दोषी ठहराया और उसे तीन साल की जेल की सज़ा सुनाई। स्टूडियो मालिक ने निचली अदालत के फ़ैसले को पटना हाई कोर्ट में चुनौती दी। तेरह साल बाद, 9 जुलाई 2026 को पटना हाई कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया और कहा कि रेप करने की साफ़ शारीरिक कोशिश का कोई सबूत नहीं था।