- ओवैसी की यूपी में एंट्री से न सिर्फ अखिलेश, मायावती, राहुल गांधी, बल्कि योगी आदित्यनाथ की भी टेंशन बढ़ जाएगी! इसी बात से अटकलें तेज हो रही हैं।

ओवैसी की यूपी में एंट्री से न सिर्फ अखिलेश, मायावती, राहुल गांधी, बल्कि योगी आदित्यनाथ की भी टेंशन बढ़ जाएगी! इसी बात से अटकलें तेज हो रही हैं।

2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले AIMIM की एंट्री से न सिर्फ समाजवादी पार्टी (SP), BSP और कांग्रेस, बल्कि BJP की भी मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं।

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मुस्लिम वोट बैंक एक बार फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति का केंद्र बन गया है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी की सक्रियता ने विपक्षी खेमे में तनाव बढ़ा दिया है। फिलहाल सवाल यह नहीं है कि ओवैसी कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेंगे, बल्कि यह है कि उनके आने से किस पार्टी के समीकरण बिगड़ेंगे और किसकी रणनीति बदलेगी।

दावा किया जा रहा है कि AIMIM 200 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। इन सबके बीच, राज्य की दूसरी राजनीतिक पार्टियों की भी चिंताएं बढ़ गई हैं। न सिर्फ कांग्रेस और समाजवादी पार्टी, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के लिए भी रास्ता आसान नहीं है।

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने खुद बताया कि ओवैसी क्यों परेशानी हैं।

कांग्रेस को सबसे बड़ी चिंता बताया जा रहा है। कांग्रेस को डर है कि मुस्लिम वोटों का बंटवारा उसके पहले से ही कमजोर सपोर्ट बेस को और कम कर सकता है। 2022 के चुनावों में कांग्रेस को मुस्लिम वोटों का कोई खास हिस्सा नहीं मिला था। इसलिए, अगर AIMIM अकेले मजबूती से चुनाव लड़ती है, तो कांग्रेस की पॉलिटिकल जगह और कम हो सकती है।

पार्टी के सीनियर नेताओं के बयानों से यह डर बढ़ गया है कि ओवैसी की एंट्री से विपक्षी एकता को नुकसान हो सकता है। कांग्रेस प्रेसिडेंट मल्लिकार्जुन खड़गे ने उत्तर प्रदेश में ओवैसी की संभावित एंट्री पर चिंता जताते हुए कहा, "उसे आने मत दो, नहीं तो वह खुद को और हमें भी बर्बाद कर देगा।" खड़गे के साथ उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से MP इमरान मसूद भी थे।

क्या SP को ओवैसी से उम्मीदें हैं?
समाजवादी पार्टी की स्थिति थोड़ी अलग मानी जा रही है। SP का दावा है कि उसे 2022 में लगभग 79 से 83 परसेंट मुस्लिम वोट मिले थे, और यही उसका मुख्य सोशल बेस है। SP ने इन आंकड़ों में लोकसभा चुनाव के नतीजों को भी शामिल किया है। सपा प्रवक्ता आशुतोष वर्मा ने  महादंगल प्रोग्राम में कहा कि पार्टी ने 2024 के चुनाव में चार मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे—अफजल अंसारी, इकरा हसन, मोहिबुल्लाह नदवी और जियाउर रहमान—ये सभी जीते।

सपा को उम्मीद है कि अगर AIMIM का असर बढ़ता है, तो किसी लेवल पर तालमेल या गठबंधन की संभावना बन सकती है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सपा मुस्लिम वोटों को अपने पक्ष में रखना चाहती है, उन्हें बांटना नहीं चाहती। इसी रणनीति के तहत सपा ने नसीमुद्दीन सिद्दीकी के साथ गठबंधन करके मुस्लिम लीडरशिप का एक नया चेहरा भी पेश किया है, ताकि लीडरशिप में कोई कमी न आए और वोटर एकजुट रहें। गौरतलब है कि AIMIM के बारे में पूछे जाने पर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने तंज कसते हुए कहा था कि अगर ओवैसी यूपी आएंगे, तो साइकिल पर सवार होकर आएंगे।

क्या AIMIM बसपा के साथ गठबंधन करेगी?
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को भी इस समीकरण से जोड़ा जा रहा है। AIMIM की यूपी यूनिट के हेड शौकत अली ने ABP न्यूज़ से बातचीत में दावा किया कि BSP के साथ गठबंधन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

हालांकि BSP की तरफ से कोई फॉर्मल जवाब नहीं आया है, लेकिन पॉलिटिकल गलियारों में अटकलें तेज़ हैं। अगर ऐसा कोई गठबंधन बनता है, तो इसका सीधा असर SP और कांग्रेस दोनों के मुस्लिम वोट शेयर पर पड़ सकता है।

क्या ओवैसी BJP के लिए भी चुनौती बनेंगे?

सिर्फ BSP, कांग्रेस और SP ही नहीं, बल्कि BJP के सामने भी बड़ी चुनौतियां हैं। पॉलिटिकल एनालिस्ट विजय उपाध्याय के मुताबिक, AIMIM BJP के लिए कोई चुनौती नहीं है, लेकिन अगर ओवैसी की पार्टी मुस्लिम-बहुल इलाकों में हिंदू उम्मीदवार उतारती है, जहां हिंदू वोट 30-40 परसेंट हैं, तो सत्ताधारी पार्टी की राह मुश्किल हो जाएगी।

दूसरी ओर, AIMIM के सामने अपनी चुनौतियां हैं। पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती इतिहास को दोहराने से बचना है। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा था। 2022 में AIMIM ने 95 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन सभी हार गई, और 94 उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हो गई।

2027 के लिए AIMIM ने क्या तैयारी की है?
वोट शेयर सिर्फ़ 0.49 परसेंट था। 2017 में भी पार्टी कोई खास असर डालने में नाकाम रही। इसलिए, 2027 में AIMIM के सामने चुनौती सिर्फ़ "वोट कटर" वाली अपनी इमेज को बदलना और खुद को एक असरदार और संगठित राजनीतिक ताकत के तौर पर स्थापित करना है।

हालांकि AIMIM के प्रेसिडेंट असदुद्दीन ओवैसी ने UP चुनाव लड़ने के बारे में साफ़-साफ़ कहा, उन्होंने कहा कि लोग पूछ रहे हैं कि वह कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेंगे, लेकिन वह अपनी कब्र से पहले चुनाव न लड़ने का अफ़सोस नहीं करना चाहते। उन्होंने विपक्षी पार्टियों पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या वे अपने दम पर लड़कर BJP को रोक सकते हैं।

इसके लिए AIMIM ने उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक किलेबंदी शुरू कर दी है। पार्टी बूथ-लेवल मैनेजमेंट पर ज़ोर दे रही है और हर ग्राम पंचायत में एक ग्राम प्रधान नियुक्त करने का दावा कर रही है। 121 सदस्यों वाली कमेटियां बनाकर जमीनी स्तर पर नेटवर्क बनाने की योजना पर काम चल रहा है, जहां बड़ी संख्या में कार्यकर्ता घर-घर जाकर संपर्क करेंगे और बूथ मैनेजमेंट संभालेंगे। पार्टी का तर्क है कि बिना वोटिंग के चुनावी सफलता नामुमकिन है। बिना किसी मज़बूत संगठन के, और यह ढांचा 2027 तक इसकी असली ताकत बन जाएगा।

इस मज़बूती के साथ, ओवैसी न केवल अखिलेश यादव बल्कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भारतीय जनता पार्टी के लिए भी चुनौती खड़ी कर सकते हैं।

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