मौलाना तौकीर रज़ा की ज़मानत अर्ज़ी खारिज करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि इस तरह का नारा लोगों को हथियारबंद विद्रोह के लिए उकसाता है।
बरेली हिंसा मामले में मौलाना तौकीर रज़ा खान को इलाहाबाद हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। हाई कोर्ट ने सोमवार को उनकी ज़मानत अर्ज़ी खारिज कर दी। जस्टिस आशुतोष श्रीवास्तव की सिंगल-जज बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान 'सर तन से जुदा' (सिर काट देने) वाले नारे पर बहुत कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि 'सर तन से जुदा' नारा भारत की आज़ादी को चुनौती देता है और इसकी तुलना 'अल्लाहु अकबर' या 'जय श्री राम' जैसे नारों से नहीं की जा सकती।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने क्या कहा?
मौलाना तौकीर रज़ा खान को बरेली हिंसा मामले में मुख्य आरोपी बनाया गया है। ज़मानत अर्ज़ी खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि "गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सज़ा, सर तन से जुदा, सर तन से जुदा" (पैगंबर का अपमान करने वाले की एक ही सज़ा है: सिर काट देना) नारे की तुलना "नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर," "जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल," "जय श्री राम," या "हर हर महादेव" जैसे धार्मिक नारों से नहीं की जा सकती।
संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देने वाला नारा
कोर्ट ने कहा कि जहाँ कुछ नारे ईश्वर या गुरु के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं, वहीं "सर तन से जुदा" (सिर काट देने) वाला नारा कानून के अधिकार और भारत की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देने जैसा है; यह लोगों को "हथियारबंद विद्रोह" के लिए उकसाता है, जो कानून के तहत दंडनीय अपराध है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसा नारा लोगों को हथियारबंद विद्रोह के लिए उकसाता है, जो एक दंडनीय अपराध है। कोर्ट ने आगे कहा कि मौलाना तौकीर रज़ा द्वारा भीड़ इकट्ठा करने के आह्वान और उसके बाद हुई घटनाओं को देखते हुए, इस चरण में उन्हें ज़मानत देना उचित नहीं होगा।
26 सितंबर, 2025 को बरेली में हिंसा
गौरतलब है कि 26 सितंबर, 2025 को बरेली में हिंसा भड़क गई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, इस घटना में भीड़ का इकट्ठा होना, पुलिस के साथ टकराव, पत्थरबाज़ी और पेट्रोल बम फेंकना शामिल था। इस मामले में मौलाना तौकीर रज़ा को मुख्य आरोपी बनाया गया है।
सोमवार को हाईकोर्ट ने मौलाना तौकीर रज़ा और डॉ. नफ़ीस, दोनों की ज़मानत अर्ज़ियां खारिज कर दीं, जबकि ऐसी खबरें भी आईं कि मामले के अन्य आरोपियों को ज़मानत मिल गई थी।